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Completed Research Studies
पूरे किए जा चुके अनुसंधान अध्ययन

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[I] Civil and Political Rights
(I) सिविल एवं राजनैतिक अधिकार

Role of Civil Administration in the Protection of Human rights in Strife-Torn Areas of
Jammu and Kashmir
    जम्मू एवं कश्मीर के संघर्ष ग्रस्त क्षेत्रों में मानव अधिकारों के संरक्षण में सिविल प्रशासन की भूमिका

The study was commissioned to the Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration, Mussoorie, Uttar Pradesh. The core objectives of the study were to- critically comprehend the role played by the State Administration, police and para-military forces to restore human rights; understand the role played by NGOs and the State Human Rights Commission in protection of human rights; and suggest remedial measures to avoid human rights violations.

इस अध्ययन का कार्य लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी, मसूरी, उत्तर प्रदेश को सौंपा गया था। अध्ययन के मुख्य उद्देश्य थे - मानव अधिकारों के संरक्षण हेतु राज्य प्रशासन, पुलिस तथा अर्ध्द-सैनिक बलों द्वारा निभाई गई भूमिका को आलोचनात्मक समझना; मानव अधिकारों के संरक्षण में गैर-सरकारी संगठनों एवं राज्य मानव अधिकार आयोग द्वारा निभाई गई भूमिका को समझना; तथा मानव अधिकारों के हनन को रोकने के लिए उपचारी उपाय सुझाना।

The main findings of the study was that human rights violations are inevitable and rampant in a disturbed area, and the administration to play its role in ameliorating the miseries of the common man. Good governance is only possible if corruption is totally rooted out. It is of utmost importance that law enforcement agencies should be empowered so that they are able to assist the judiciary in protecting the rights of the common people. Lastly, the State will have to create funds to remove the economic miseries of the victims of terrorism.

अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष था कि अशांत क्षेत्रों में मानव अधिकारों का हनन अवश्यंभावी एवं प्रबल है तथा आम आदमी के दु:खों को दूर करने में प्रशासन को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। सुशासन तभी संभव है जब भ्रष्टाचार का पूर्णत: उन्मूलन हो। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि कानून प्रवर्तन अभिकरणों को सशक्त बनाया जाए ताकि वे आम जनता के अधिकारों की रक्षा करने में न्यायपालिका की सहायता करने में सक्षम हों। अंतत: आतंकवाद के पीड़ितों के आर्थिक कष्टों को समाप्त करने के लिए राज्यों को फंड का निर्माण करना चाहिए।


A Study of the Underlying Causes of Human Rights Violations as a Result of Insurgency in North East, the Nature of State Response, the Use of Special Laws, Violations by Non-state Actors, and Practical Suggestions / Recommendations for Improvement in the Situation – A Research Study in Tripura
पूर्वोत्तार में उग्रवाद के परिणाम स्वरूप मानव अधिकारों के हनन के कारणों, राज्य के उत्तारों की प्रकृति, विशेष कानूनों का प्रयोग, गैर-राज्य कार्यकर्त्ताओं द्वारा उल्लंघन तथा स्थिति में सुधार हेतु व्यावहारिक सुझाव / संस्तुतियों का अध्ययन - त्रिपुरा में अनुसंधान अध्ययन

The study was given to Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration, Mussoorie, Uttar Pradesh. The study made an attempt to understand the nature of ethnic conflict between the tribals in Tripura and the non-tribals (mainly Bengalis), and insurgency related violence.

इस अध्ययन का कार्य लाल बहादुर राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी, मसूरी, उत्तर प्रदेश को दिया गया था। इस अध्ययन का उद्देश्य त्रिपुरा में आदिवासियों एवं गैर-आदिवासियों (मुख्यत: बंगालियों) के बीच द्वन्द्व की प्रकृति तथा संघर्ष से संबंधित हिंसा के विषय में समझने का प्रयास करना था।


The primary objectives of the study were to- analyse the role of insurgency in perpetuation of human rights violations; comprehend the role played by the State actors and non governmental organizations (if any) in restoring human rights; and suggest remedial measures to improve the situation.

अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य थे - मानव अधिकारों के हनन के स्थायीकरण में उग्रवाद की भूमिका के सर्वेक्षण, मानव अधिकारों को कायम रखने में राज्य कार्यकर्ताओं तथा गैर सरकारी संगठनों (यदि कोई हों) द्वारा निभाई गई भूमिका तथा स्थिति में सुधार हेतु उपचारी उपाय सुझाव


According to the study, the panacea to the violation of human rights in Tripura is the end of insurgency. The study has suggested a number of remedial measures to end insurgency which includes development (trickle-down), administrative planning, education, awareness and conscious security measures and policing.

अध्ययन के अनुसार त्रिपुरा में मानव अधिकारों के हनन को खत्म करने के लिए विद्रोह की स्थिति को खत्म करना एक रामबाण है। अध्ययन में विद्रोह की स्थिति को समाप्त करने के लिए अनेक उपचारी उपाय सुझाए गए हैं जिसमें विकास, प्रशासनिक योजना, शिक्षा, जागरूकता तथा सचेत सुरक्षोपाय एवं पुलिसिंग शामिल हैं।


[II] Rights of Other Vulnerable Groups
(II) अन्य कमजोर वर्गों के अधिकार

Dependency on Forests for Livelihood and Its Impact on Environment - A Case of the Baiga Tribe of Mandla District, Madhya Pradesh
    जीविकोपार्जन हेतु वनों पर निर्भरता तथा पर्यावरण पर इसका प्रभाव - मध्य प्रदेश के मंडला जिले के बैगा
    जनजाति का मामला

The study was conducted by Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration, Mussoorie, Uttar Pradesh. The objectives of the study were to- understand the conditions which impact the Baiga dependency on the forests; see how the Baiga may get gainful employment; see the relationship between Baiga livelihood patterns and government schemes; analyse the impact of laws and policies on Baiga people; and suggest measures by which the Baigas can benefit through a sustainable use of their local natural resources.

यह अध्ययन लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी, मसूरी, उत्तर प्रदेश द्वारा किया गया था। अध्ययन के मुख्य उद्देश्य थे - वनों पर बैगाओं की निर्भरता पर प्रभाव डालने वाली दशाओं को समझना; यह देखना कि बैगा किस प्रकार लाभप्रद रोजगार पाते हैं; बैगा के जीवनयापन पध्दति तथा सरकारी योजनाओं के बीच संबंध देखना; बैगा लोगों पर कानूनों एवं नीतियों के प्रभाव का विश्लेषण करना तथा ऐसे उपाय सुझाना जिनके द्वारा बैगा अपने स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का सतत प्रयोग करके लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

The report of the study concluded that land based activities reduce dependence on forests and therefore a viable and sustainable model of agriculture is necessary. The report further recommends that urgent steps need to be taken to provide employment opportunities and access to credit, and infrastructure support for enhancing the capabilities of Baiga people.

अध्ययन की रिपोर्ट का निष्कर्ष था कि भूमि आधारित गतिविधियों से वनों पर निर्भरता कम हो सकती है तथा इसके लिए कृषि के व्यवहार्य एंव सतत् मॉडल की आवश्यकता है। रिपोर्ट में यह संस्तुति भी की गई थी कि बैगा लोगों की क्षमताओं का विस्तार करने के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाने एवं ऋण सुगमता तथा ढांचागत समर्थन देने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।


The Musahar: A Socio-economic Study
मुसहर - सामाजिक - आर्थिक अध्ययन

The study was conducted by A.N. Sinha Institute of Social Studies, Patna. Musahars are the most primitive among the scheduled castes. They are found in the States of Bihar, Madhya Pradesh and Jharkhand.

यह अध्ययन ए. के. सिन्हा इंस्टीटयूट ऑफ सोशल स्टडीज पटना द्वारा किया गया था। अनुसूचित जातियों में सबसे पिछड़ी जाति है - मुसहर। ये बिहार, मध्य प्रदेश तथा झारखंड राज्यों में पाए जाते हैं।


The objectives of the study were to- observe the socio-economic conditions and life-style of the Musahar; record their occupation and process of exploitation; suggest strategies to save them from inhuman exploitation through child labour, prostitution, beggary etc.; and to ensure sustainable developmental inputs based on indigenous raw material.

अध्ययन के उद्देश्य थे - मुसहरों की सामाजिक -आर्थिक दशाओं और रहन-सहन का पता लगाना; उनके व्यवसाय एवं शोषण की प्रक्रिया को रिकॉर्ड करना; बाल मजदूरी, वैश्यावृत्ति आदि के माध्यम से अमानवीय शोषण से उन्हें बचाने के लिए नीतियों का सुझाव देना तथा देशी कच्चे माल पर आधारित निवेश से सतत् विकास सुनिश्चित करना।


The study recommended that a special action programme be evolved and implemented for the holistic development of Musahars.

अध्ययन में संस्तुति की गई कि मुसहरों के विकास हेतु एक विशेष कार्य योजना का विकास एवं क्रियान्वयन किया जाना चाहिए।


Accordingly, follow-up action was taken after the report was submitted to the Commission. Based on the recommendations made, Mr. K.B. Saxena, IAS (Retd) prepared an Action Plan to alleviate the conditions of the Musahars. The findings of the study along with the Action Plan were sent to all concerned Ministries in the Government of India and to the Government of Bihar.

तदनुसार आयोग को रिपोर्ट के पश्चात अनुवर्ती कार्रवाई की गई थी। संस्तुतियों के आधार पर श्री के. बी. सक्सेना, आई.ए.एस. (सेवानिवृत्त) ने मुसहरों की दशाओं को सुधारने के लिए एक कार्य योजना तैयार की। कार्य योजना के साथ अध्ययन की खोजों को भारत सरकार के सभी संबध्द मंत्रालयों तथा बिहार सरकार को भेजा गया था।


[III] Rights of Mentally- Ill Persons
(III) मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों के अधिकार

Plight of Mentally Ill Persons Languishing in Chamatkari Hanumanji Temple in Chhindwara District of Madhya Pradesh
   मध्य प्रदेश के छिन्दवाड़ा जिले में चमत्कारी हनुमान जी मंदिर में पड़े मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों की दुर्दशा

The NHRC entrusted a pilot project to SEVAC, Calcutta for protecting the human rights of mentally ill persons languishing in the Chamatkari Hanumanji Temple in Chhindwara District of Madhya Pradesh. The main objective of the project was to create awareness among the family members of mentally ill patients languishing in the temple and in the process bring them under the purview of psychiatric treatment. Its other objective was to carry out the groundwork for setting-up a psychiatric camp in the temple premises for diagnosis and counselling.

   The final report of the project revealed the pathetic conditions of mentally ill persons suffering in the temple. These patients and their relatives either live in the temple premises or some guest house or jhoprinearby and at times even in open fields with no sanitation facilities. During the course of the pilot project, 1,069 mentally ill patients were interviewed. They were in the age group of 15-30 years (55.75%). More than 32 per cent were in the age group of 31-50 years. Majority of these persons were daily wage earners (92%) and suffered from mental illness. Seventy-nine per cent of the caregivers, who were generally close relatives of the patients, stated that they were ready for psychiatric treatment provided it is accessible and the medicines are made available to the patients free of cost.

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने मध्यप्रदेश के छिन्दवाड़ा जिले में चमत्कारी हनुमान जी मंदिर में पड़े मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के मानव अधिकारों के संरक्षण हेतु एस.ई.वी.ए.सी., कोलकाता को एक पायलट प्रोजेक्ट सौंपा था। प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य मंदिर में पड़े मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के परिवार के सदस्यों के बीच जागरूकता फैलाना तथा इस प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिक उपचार की परिधि में उन्हें लाना था। इसका दूसरा उद्देश्य मंदिर परिसर में निदान एवं परामर्श हेतु मनाचिकित्सीय कैम्प स्थापित करने के कार्य को अंजाम देना था।

   प्रोजेक्ट की अंतिम रिपोर्ट में मंदिर में मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों की दयनीय दशाओं का खुलासा हुआ। ये रोगी तथा उनके रिश्तेदार या तो मंदिर परिसर में रहते हैं अथवा किसी नज़दीक गेस्ट हाउस या झोपड़ी में रहते हैं तथा कई बार तो खुले मैदानों में भी रहते हैं। जहां कोई साफ-सफाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है। पायलट प्रोजेक्ट की अवधि के दौरान 1069 मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों का साक्षात्कार लिया गया। वे 15-30 वर्ष की आयु वर्ग के थे (55.75%)। 32 प्रतिशत से अधिक दिहाड़ी मजदूर (92%) थे तथा मानसिक रूप से बीमार थे। इनका ध्यान रखने वालों, जो कि सामान्यतः रोगियों के नजदीकी रिश्तेदार थे, ने कहा कि वे मनोचिकित्सीय उपचार के लिए तैयार हैं बशर्ते कि यह उनकी पहुंच में हो तथा रोगियों को निःशुल्क दवाएं उपलब्ध कराई जाएं।


Quality Assurance in Mental Health
मानसिक स्वास्थ्य में गुणवत्ता आश्वासन

The National Institute of Mental Health And Neuro Sciences (NIMHANS), Bangalore conducted the study on 'Quality Assurance in Mental Health'. The objectives of the study were to- prepare a plan of action for improving conditions in mental hospitals in the country and generating awareness about the rights of those afflicted with mental disabilities.

नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (निमहंस), बंगलुरू ने 'मानसिक स्वास्थ्य में गुणवत्ता आश्वासन' संबंधी अध्ययन किया था। अध्ययन के उद्देश्य थे - देश में मानसिक अस्पतालों में दशाओं को सुधारने के लिए कार्य योजना तैयार करना तथा मानसिक अशक्तताओं से प्रभावित व्यक्तियों के अधिकारों के विषय में जागरूकता उत्पन्न करना।


Few of the main recommendations, inter alia, included - provide out patient services preferably in a separate block; provide twenty-four hours casualty and emergency services; a short stay ward of five to ten beds to admit emergency cases; to provide open ward with a provision for a relative to stay with the patient; provide for intensive care unit with separate nursing staff, ward attendants, etc..

मुख्य संस्तुतियों में अन्य बातों के साथ-साथ शामिल थे - मुख्यत: पृथक ब्लॉक में ब्राह्म रोगी सेवाएं उपलब्ध कराना; आपातकालीन मामलों में भर्ती हेतु पांच से दस बिस्तरों का शॉर्ट स्टे वार्ड; रोगियों के साथ रिश्तेदारों के रहने के लिए व्यवस्था सहित ओपन वार्ड उपलब्ध करवाना; पृथक नर्सिंग स्टाफ, वार्ड परिचारक आदि सहित गहन देख-रेख यूनिट उपलब्ध करवाना।


Copies of the report were sent to all the mental hospitals in the country and also to the State Health Secretaries for necessary follow up action.

रिपोर्ट की प्रतियां आवश्यक अनुवर्ती कार्रवाई हेतु देश में सभी मानसिक अस्पतालों के साथ-साथ राज्य स्वास्थ्य सचिवों को भी भेजी गई थीं।


Based on the discussions held at the meeting of Health Secretaries and Mental Health Authorities of all States in May 2008, the Commission published an updated book on “Mental Health Care and Human Rights” in October 2008.

मई 2008 में सभी राज्यों के स्वास्थ्य सचिवों एवं मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकारियों के साथ हुई बैठक में हुई चर्चा के आधार पर आयोग ने अक्तूबर में 'मानसिक स्वास्थ्य एवं मानव अधिकार' विषय पर एक अद्यतन पुस्तक का प्रकाशन किया।


"Operation Oasis" - A Study of Mentally Ill Persons in West Bengal
''ऑपरेशन ओएसिस'' - पश्चिम बंगाल में मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों का अध्ययन

Sane and Enthusiast Volunteers' Association of Calcutta (SEVAC), a Kolkata based NGO conducted the study for the Commission in March 2001. The objectives of the project were to determine the percentage of mentally-ill and mentally disabled among the inmates of jails and other custodial homes in West Bengal; and assess their living conditions to determine whether the human rights of inmates are adequately protected or not.

मार्च 2001 में आयोग के लिए सेन एंड एन्थूजियास्ट वॉलेन्टीयर एसोसिएशन ऑफ कोलकाता (एस ई वी ए सी), कोलकाता स्थित एक गैर सरकारी संगठन, ने यह अध्ययन किया था। परियोजना के उद्देश्य थे - पश्चिम बंगाल में जेलों एवं अन्य हिरासत गृहों के संवासियों के बीच मानसिक रूप से बीमार एवं मानसिक रूप से अशक्त व्यक्तियों के प्रतिशत का पता लगाना तथा यह पता लगाने के लिए कि संवासियों के मानव अधिकारों का उचित प्रकार से संरक्षण हो रहा है अथवा नहीं उनके जीवन-यापन की दशाओं का मूल्यांकन करना।


The project was implemented in : - Dumdum Central Correctional Home (Male), Presidency Correctional Home (Female), Berhampore Central Correctional Home (Male and Female), Mahalandi (Male & Female), Uttarpara (Female), Dhakuria (Male), S.M.M. Home, Liluah, Howrah (Female).

सी परियोजना का कार्यान्वयन किया गया था - दमदम केन्द्रीय सुधार गृह (पुरूष), प्रेसिडेंसी सुधार गृह (महिला), बरहामपुर केन्द्रीय सुधार गृह (पुरूष एवं महिला), महालंदी (पुरूष एवं महिला), उत्तरपाड़ा (महिला), धकुरिया (पुरूष), एस.एम.एम. होम, लिलुआ, हावड़ा (महिला)


[IV] ECONOMIC, SOCIAL AND CULTURAL RIGHTS
(IV) आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकार

Developing Code of Ethics for Indian Industries.
   भारतीय उद्योगों के लिए आचार संहिता का विकास करना

National Human Rights Commission had entrusted the above research study to the Institute of Corporate Sustainability Management (ICSM) Trust, New Delhi in December 2012. Its objective were to- develop a code of ethics for Indian industries by drawing from international norms and review company’s employees-policies and procedure manual including gender policy, purchase policy, employment compensation and benefit and promotion policy, environment policy, community policy, international relationship policy etc. For the study the Board Members, accounting personnel, human resource personnel, marketing personnel, vendors, customers, consumer courts etc were also contacted to collect information besides institutions like pollution control board, labour commissioners, social welfare board and individuals responsible for community development and environmental programmes. Data was collected from ten sectors, namely, steel, power, mines, cement, paper, FMCG, sugar, banking & MFI, textile and pharmacy.

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने दिसम्बर, 2012 में उपर्युक्त अनुसंधान अध्ययन की जिम्मेदारी इंस्टीट्यूट काॅरपोरेट सस्टेनबिलिटी मैनेजमेंट (आई.सी.एस.एम.) ट्रस्ट, नई दिल्ली को सौंपी थी। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर भारतीय उद्योगों के लिए आचार संहिता विकसित कर कम्पनियों के कर्मचारियों की नीतियों की समीक्षा करना तथा जेंडर नीति, क्रय नीति, रोजगार हर्जाना एवं सुविधा तथा पदोन्नति नीति, पर्यावरण नीति, सामुदायिक नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध निधि इत्यादि का विकास करना था। अध्ययन के लिए सामुदायिक विकास एवं पर्यावरण कार्यक्रम के लिए जिम्मेदार संस्थाओं जैसे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, श्रम आयुक्त, समाज कल्याण बोर्ड एवं व्यक्तियों के अलावा बोर्ड सदस्यगण, जवाबदेह कार्मिकों, मानव संसाधन कार्मिकों, विपणन कार्मिकों, विक्रेताओं, ग्राहकों, उपभोक्ता न्यायालयों इत्यादि से भी संपर्क किए गए। दस क्षेत्रों जैसे स्टील, पाॅवर, खान, सीमेंट, पेपर, एफ.एम.सी.जी., चीनी, बैंकिंग एवं एम.एफ.आई., इस्पात तथा फार्मेसी से डाटा एकत्रित किए गए।

The study developed twelve Code of Ethics as follows:
अध्ययन द्वारा विकसित बारह आचार संहिताएं निम्न प्रकार हैंः

1. Inclusive Business: Company should respect the local cultures, customs and traditions in which it operates.
   संयुक्त व्यापार: कम्पनी को स्थानीय संस्कृति, रीति-रिवाज एवं परम्पराओं का सम्मान करना चाहिए, जहां यह कार्य करती हैं।

2. Accountable Business: Companies must conform to trade procedures, including licensing, documentation    and other necessary formalities, as applicable.
    जवाबदेह व्यापार: कम्पनियों को यथा उपयुक्त, दस्तावेजन एवं अन्य आवश्यक औपचारिकताओं सहित व्यापार प्रक्रियाओं को    स्वीकार करना चाहिए।

3. Transparent Business Standards: Internal accounting and audits procedures should be promoted that fairly    and accurately assesses all business transactions and disposition of assets.
    पारदर्शी व्यापार मानक: आन्तरिक लेखा-जोखा तथा लेखा परीक्षा प्रक्रिया को बढ़ावा देना चाहिए ताकि सभी नागरिक लेन-देन एवं    परिसंपत्तियों के स्वभाव का उपयुक्त एवं सटीक मूल्यांकन हो सके।

4. Commitment to Professed Quality and Representation Accuracy: The Company should remain committed to    supply goods and services at world class quality standards, backed by after-sales services consistent with    the requirements of its customers.
    गुणवत्ता व्यक्त करने की प्रतिबद्धता एवं सटीक प्रस्तुतीकरण: कम्पनी को ग्राहकों की आवश्यकता के अनुसार कम्पनी को माल की    आपूर्ति एवं सेवा विश्व स्तरीय गुणवत्ता मानकों द्वारा, बिक्री पश्चात सेवाओं की मदद से सतत प्रतिबद्ध रहना चाहिए।

5. Fair Competition: While fostering competitiveness, company must ensure that they do not engage in unfair    trade practices.
    निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा: प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करते समय कम्पनी को सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अनुचित व्यापार कार्य में लिप्त न    हों।

6. Equal opportunities employer: Companies should provide equal opportunities to all qualified employees    regardless to their race, caste, religion colour, ancestry, marital status, gender, sexual orientation, age    nationality, ethnic origin or disability.
    समान अवसर देने वाले नियोक्ता: कम्पनी को सभी योग्य कर्मचारियों, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, रंग, पूर्वज, वैवाहिक स्थिति,    जेंडर, यौन अभिविन्यास, उम्र, राष्ट्रीयता, नस्ली उत्पत्ति या अशक्तता को समान अवसर देने चाहिए।

7. Upholding of Employee Human Rights: Employee must be treated with dignity without any form of    harassment.
   कर्मचारियों के मानव अधिकारों का ध्यान रखना: कर्मचारी के साथ बिना किसी उत्पीड़न के गरिमापूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

8. Health, Safety and Environment: Company must provide a safe, healthy, clean and ergonomic working    environment for their employees and indirect workers.
   स्वास्थ्य, सुरक्षा एवं पर्यावरण: कम्पनी को अपने कर्मचारियों एवं अप्रत्यक्ष कर्मचारियों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ, साफ एवं कार्य दक्षता    संबंधी माहौल तैयार करना चाहिए।

9. Corporate Citizenship: The Company should comply to all laws and regulations, and assist in improving of    quality of life of the people in the communities in which they operate.
   कार्पोरेट नागरिकता: कम्पनी को सभी नियम एवं उपबन्धों का पालन करना चाहिए तथा समुदायों, जहां यह परिचालन करते हैं, में    लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने हेतु मदद करनी चाहिए।

10. Stakeholder Representation: Company should ensure representation of all stakeholders, at appropriate    forums.
   पणधारी प्रतिनिधित्व: कम्पनी को उपयुक्त मंचों में सभी पणधारियों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना चाहिए।

11. Business Association: Companies should ensure that their business partners conduct their business in    accordance with the code of ethics within their scope of operations.
   व्यापार संघ: कम्पनी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके व्यापार साझेदार अपना व्यापार अपने परिचालन के दायरे में आचार    संहिता के अनुसार व्यापार संचालित करे।

12. Conflict of interest: All forms of conflict of interest must be avoided from top management to workers.    NHRC is of the view that the above code of ethics has to be built within the organizational systems,    processes, structure and staff.
   हितों का टकराव: उच्च प्रबंधन की तरफ से श्रमिकों के लिए सभी प्रकार के हितों के टकराव को टालना चाहिए। राष्ट्रीय मानव    अधिकार आयोग की अपनी राय है कि संस्थागत प्रणाली, प्रक्रिया, संरचना एवं कर्मचारी में उपर्युक्त आचार संहिता का निर्माण किया    जाए।



Research Study on Governance Challenges for Implementation of Workers’ Rights in    Hazardous Industries : A Study of Alang-Sosiya Ship-Breaking Yard, Gujarat
   जोखिम भरे उद्योगों में श्रमिकों के अधिकारों के कार्यान्वयन हेतु सरकारी चुनौतियों पर अनुसंधान अध्ययनः एलांग-    सोसिया शिप-ब्रेकिंग यार्ड, गुजरात का एक अध्ययन

This research study was commissioned by the NHRC to the Tata Institute of Social Sciences (TISS), Mumbai in March 2013. The main objectives of the study are to – identify major issues revolving around workers rights in hazardous industries at Alang-Sosiya, Bhavnagar along with developing and sharing information related to working conditions so as to reduce workers vulnerabilities in ship-breaking industries; develop an institutional mechanism and make recommendations to improve existing working conditions of workers and reduce environmental implications of ship-breaking industries at Alang-Sosiya; and develop a model for building a network of stakeholders involved in the ship-breaking industries at Alang-Sosiya, Bhavnagar. The study was initiated by TISS in April 2013 and its duration is of one year.

   The findings of the research study has primarily revealed that the labourers were living in inhuman conditions and were denied of basic facilities like drinking water, housing, hygiene, and sanitation. The labourers in the ship breaking yard worked for 10-12 hours and continuously worked for more than 240 days in a year but did not get minimum wages on time or any bonus; they were also not given leave of any kind nor were wages paid to them during the leave period; in case of accidents, wages of labourers were deducted by the employer’s for treatment given to them; they were deprived of wage slip, gratuity, provident fund, paid weekly day of rest and other benefits and social measures due to them and furthermore, all the labourers were deprived of standard personal protective equipments and safety kits as recommended to avoid health risks during working hours and it was reported that since 2009 onwards a total of 77 deaths had taken place on account of accidents.

इस अनुसंधान अध्ययन की शुरूआत राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल सांइसेस (टिस), मुम्बई से मार्च, 2013 में की गई थी। इस अध्ययन के मुख्य उद्देश्य- एलांग सोसिया, भावनगर में जोखिम भरे उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों के अधिकारों संबंधी मुख्य मुद्दों की पहचान के साथ-साथ कार्य दशाओं संबंधी सूचना का विकास तथा साझा करने के साथ-साथ शिप ब्रेकिंग इंडस्ट्रीज में श्रमिकों पर होने वाले खतरे को कम करना; संस्थागत तत्वों का विकास तथा विद्यमान कार्य स्थिति में सुधार के लिए संस्तुति एवं एलांग सोसिया में शिप ब्रेकिंग इंडस्ट्रीज के पर्यावरण संबंध को कम करने; तथा एलांग-सोसिया, भावनगर में शिप ब्रेकिंग इंडस्ट्रीज में संलिप्त पणधारियों के नेटवर्क निर्माण के लिए माॅडल का विकास करना था। इस अध्ययन का श्री गणेश अप्रैल, 2013 में टिस द्वारा किया गया एवं इसकी अवधि एक वर्ष की थी।

इस अनुसंधान अध्ययन के निष्कर्ष से यह पता चलता है कि सभी मजदूर काफी अमानवीय स्थिति में जीवन-यापन कर रहे थे तथा उन्हें मूल सुविधाओं जैसे पेयजल, मकान, स्वच्छता एवं सफाई से वंचित रखा जाता था। शिप ब्रेकिंग में कार्यरत मजदूर वर्ष में 240 दिन से भी ज्यादा 10-12 घण्टे तक कार्य करते थे लेकिन समय पर न्यूनतम मजदूरी या किसी प्रकार का बोनस नहीं मिलता था, उन्हें किसी प्रकार की छुट्टी भी नहीं दी जाती थी और छुट्टी की अवधि के दौरान उन्हें मजदूरी भी नहीं दी जाती थी; दुर्घटना घटने पर उनके उपचार पर हुए खर्च को मालिकों द्वारा उनकी मजदूरी से काट लिया जाता था; उन्हें मजदूरी पर्ची, उपदान, भविष्य निधि, विश्राम के साप्ताहिक दिन का भुगतान एवं अन्य सुविधाओं तथा सामाजिक सुरक्षा से वंचित रखा जाता था। इसके साथ ही, सभी श्रमिकों को कार्यावधि के दौरान स्वास्थ्य जोखिम को टालने हेतु यथा संस्तुत मानक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों तथा सुरक्षा किट से वंचित थे तथा यह रिपोर्ट की गई कि वर्ष 2009 से दुर्घटना की वजह से कुल 77 लोगों की मौत हो गई।


Economic, Social and Cultural Rights: A Study to Assess the Promotion of Economic, Social and Cultural Rights in India
    आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकार - भारत में आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों का
    मूल्यांकन करने के लिए अध्ययन

This study was an attempt to assess the situation of economic, social and cultural rights (ESCR) in India. It was entrusted by the Commission to the National Centre for Advocacy Studies (NCAS), a Pune based NGO. It was conducted in three States, namely, Maharashtra, Karnataka and Chhattisgarh.

यह अध्ययन भारत में आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों की दशाओं का मूंल्याकन करने का प्रयास था। आयोग द्वारा यह कार्य पुणे स्थित एक गैर सरकारी संगठन नेशनल सेंटर फॉर एडवोकेसी स्ट्डीज (एन सी ए एस) को सौंपा गया था। यह अध्ययन तीन राज्यों महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं छत्तीसगढ़ में किया गया था।


The core objectives of the study were to- analyze the Government’s resource allocation for the realization of ESCRs especially the rights related to food, health and education with particular reference to the marginalized (Adivasis, Dalits, women and children) and to explore civil society initiatives in helping people to claim ESCRs.

अध्ययन के मुख्य उद्देश्य थे - हाशिये पर स्थित व्यक्तियों (आदिवासी, दलित, महिलाएं, एवं बच्चों) के विशेष संदर्भ में खासतौर पर भोजन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा से संबंधित विषयों पर ई एस सी आर के उपयोग हेतु सरकारी संसाधनों के आबंटन का विश्लेषण करना तथा ई एस सी आर का उपयोग करने के लिए लोगों को सहायता करने में सभ्य समाज की पहलों का पता लगाना।


[V] RIGHTS OF THE DISABLED
(V) अशक्तों के अधिकार

NHRC-CHRC -IGNOU Linkage Project on ‘Human Rights for Persons with Disablities’
'अशक्त व्यक्तियों के अधिकार' संबंधी एन एच आर सी - सी एच आर सी - इग्नू लिंकेज प्रोजेक्ट

It was a collaborative project of the National Human Rights Commission of India, the Canadian Human Rights Commission and Indira Gandhi National Open University, Delhi.

यह राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग - भारत, मानव अधिकार आयोग - कनाडा तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली की संयुक्त परियोजना थी।


The main objective of the project was to create conditions for effective use of human rights instruments for protection of the rights of persons with disabilities. Its other objective was to encourage and advise on the development of jurisprudence in the area of human rights of persons with disabilities that may be of use to national and international advocates. The thrust of the project was to improve the capacity of academic and advocacy organizations for better application of domestic and international human rights law in the promotion and protection of the rights of disabled. For grounding firmly the human rights perspective on disability, the project worked towards effecting change in the programmes of legal and human rights studies. To facilitate effective delivery of disability and human rights component in the study programmes, an impressive body of resource materials and references were compiled and widely shared. These materials include: a) An in-depth analysis of legal frameworks and their relevace in the disability context. b) Examples of jurisprudence- disability specific or those which are helpful in clarifying the content of rights, obligations of the State and the broad human rights principles. Two manuals, 17 research papers make up the resource kit, which also includes a curriculum design for a course in Human Rights Disability and Law and a Bibliography.

इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य अशक्त व्यक्तियों के अधिकारों के सरंक्षण हेतु मानव अधिकार दस्तावेजों के प्रभावी प्रयोग हेतु दशाएं निर्मित करना था। इसका अन्य उद्देश्य राष्ट्रीय एवं अंतर राष्ट्रीय समर्थनों में इस्तेमाल किए जा सकने वाले अशक्त व्यक्तियों के मानव अधिकारों के क्षेत्र में न्यायशास्त्र के विकास को प्रोत्साहित करना एवं सुझाव देना था। अशक्त व्यक्तियों के अधिकारों के संवर्ध्दन एवं संरक्षण में घरेलू एवं अंतररष्ट्रीय मानव अधिकार कानूनों के बेहतर प्रयोग हेतु शैक्षिक एवं सर्मथनकारी संगठनों की क्षमता सुधारना इस परियोजना का लक्ष्य था। अशक्तता पर मानव अधिकार अध्ययनों में प्रभावी परिवर्तन की दिशा में परियोजना में कार्य किया गया था। अशक्तता की प्रभावी पहुंच तथा अध्ययन कार्यक्रमों में मानव अधिकार अव्यवों को सहायता देने के लिए संसाधन सामग्री एवं सदर्भों को संग्रहित एवं व्यापक रूप से साझा किया गया था। इन सामग्रियों में शामिल थे - (क) अशक्तता के संदर्भ में विधिक संरचना एवं उनकी प्रासंगिकता का गहन विश्लेषण (ख) अशक्तता विशिष्ट न्यायशास्त्र के उदाहरण अथवा जो अधिकारों के अव्यवों, राज्य के दायित्वों तथा व्यापक मानव अधिकार सिध्दांतों को स्पष्ट करने में सहायक हों। 17 अनुसंधान पेपरों से संसाधन किट का निर्माण किया गया जिसमे मानव अधिकार अशक्ता एवं कानून तथा बिबलियोग्राफी में पाठयक्रम हेतु विषय परक डिजाइन शामिल है


Estimating Precise Costs and Providing Level Playing Field to Persons with Disabilities (PWDs)
    अशक्त व्यक्तियों के लिए सुनिश्चित लागत का आकलन करना तथा स्तरीय कार्य क्षेत्र उपलब्ध कराना।

This study was entrusted by the Commission to the National Association for the Blind, New Delhi and was conducted in Rajasthan, Orissa and Karnataka.

आयोग द्वारा यह अध्ययन कार्य राष्ट्रीय दृष्टिबधित एसोसिाएशन, नई दिल्ली को सौंपा गया था तथा यह अध्ययन राजस्थान, ओड़िशा तथा कर्नाटक में किया गया था।


The study was aimed at quantifying the additional costs of living of the PWDs based on degree of disability, region of habitation, type of employment possibility, social set-ups and topography. Core objectives were to assess the gap between the minimum support needed by PWDs as producers (contributors to the economy) and consumers (user of social services), and to recommend steps to bridge this gap through better utilization of existing schemes, the introduction new schemes, and the utilization of community resources and individual professional skills.

इस अध्ययन का उद्देश्य अशक्तता की मात्रा, आवास क्षेत्र, रोजगार संभावनाओं की प्रकृति, सामाजिक सरंचना तथा टॉपो ग्राफी के आधार पर अशक्त व्यक्तियों की जीवनयापन की अतिरिक्त लागत का मूल्यांकन करना था। इसके अन्य उद्देश्य थे - अशक्त व्यक्तियों द्वारा उत्पादक के रूप में (अर्थव्यवस्था में योगदान) तथा उपभोक्ता (सामाजिक सेवाओं का उपभोग करनेवाला) के रूप में अनिवार्य न्यूनतम समर्थन के बीच अंतर का आकलन करना तथा विद्यमान योजनाओं के बेहतर प्रयोग, नई योजनाएं शुरू करने तथा सामुदायिक संसाधनों का प्रयोग करके तथा व्यक्तिगत व्यावसायिक दक्षताओं के माध्यम से इस अंतर को कम करने के लिए किए जाने वाले कार्यों की संस्तुति करना था।


[VI] CHILD RIGHTS
(VI) बाल अधिकार

Freedom Mortgaged and Future Abandoned: Bonded Child Labour in Karnataka Silk Industries
    फ्रीडम मोर्टगेज्ड़ एंड फ्यूचर अबंडन्ड : कर्नाटक सिल्क उद्योग में बंधुआ बाल मजदूर

The Commission in May 2004 entrusted a research project titled ‘Freedom Mortgaged and Future Abandaoned : Bonded Child Labour in Karnataka’s Silk Industry’ to Dr. Gopal K Kadekodi, Director, Institute of Social and Economic Change (ISEC).

आयोग ने मई 2004 में 'फ्रीडम मॉर्टगेज्ड एंड फ्यूचर अबंडन्ड बांडेड चाइल्ड लेबर इन कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज' शीर्षक से एक अनुसंधान परियोजना का कार्य डॉ0 गोपाल के कडेकोडी, निदेशक, इंस्टीटयूट ऑफ सोशल एंड इकोनोमिक चेन्ज (ई एस ई सी) को सौंपा था।


The objectives of the project were
परियोजना के उद्देश्य थे -


To analyze the household conditions contributing to the occurrence of child labour and bonded child labour in the silk industry in Karnataka,
कर्नाटक में रेशम उद्द्योग में बाल मजदूरी एवं बंधुआ बाल मजदूरी के होने के लिए जिम्मेदार घरेलु दशाओं का विश्लेषण

To examine the processes leading to the emergence of bonded child labour in silk industry and to examin the working conditions,
रेशम उद्योग में बंधुआ बाल मजदूरी के उत्पन्न होने की प्रक्रियाओं की जांच करना तथा कार्य करने की दशाओं की जांच करना

To estimate the magnitude of child labour and bonded child labour in sericulture in Karnataka,
कर्नाटक में रेशम उद्योग में बाल मजदूरी व बंधुआ बाल मजदूरी के आकार का आकलन

To analyze the policies and programmes of Govt. and Non-Govt. agencies in eliminating child and bonded child labour in silk industry
कर्नाटक में रेशम-उत्पादन में बाल मजदूरी एवं बंधुआ बाल मजदूरी के उन्मूलन में सरकारी तथा गैर-सरकारी नीतियों तथा कार्यक्रमों का विश्लेषण

To suggest ways to eliminate child labour and promote child rights.
बाल मजदूरी का उन्मूलन तथा बाल अधिकारों का संवर्ध्दन करने के लिए उपाय सुझाना


The duration of the project was of 06 months. The study report submitted by the Director ISEC Bangalore was considered by the Commission in May 2009 and accepted.
परियोजना की अवधि 6 माह थी। आई सी ई सी बंगलुरू के निदेशक द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर आयोग द्वारा मई 2009 में विचार किया गया तथा स्वीकार किया गया था।

Current Trends in Child Labour: A Study of Beedi Industry in Bharatpur-II Block, Murshidabad Distt, West Bengal
    बाल मजदूरी में वर्तमान प्रवृत्तियों: पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के भरतपुर- II ब्लॉक में बीड़ी
    उद्योग का अध्ययन

Surul Centre for Services in Rural Area (CSRA), Birbhum, West Bengal was assigned the project in 2004 by the Commission. The Project highlighted the plight of children working in beedi industry. The study focussed on home based workers in rural areas. Some villages were selected as the study area which covered about 40% of the beedi making villages of the block. The data were collected from beedi making children as well as from their parents, employers, local NGOs, blocks, gram panchayats, district officers.

आयोग द्वारा वर्ष 2004 में यह प्रोजेक्ट सुरूल सेंटर फॉर सर्विसेज इन रूरल एरिया (सी एस आर ए), बीरभूम, पश्चिम बंगाल को सौंपा गया था। प्रोजेक्ट में बीड़ी उद्योग में कार्यरत् बच्चों की दुर्दशा को रेखांकित किया गया था। यह अध्ययन ग्रामीण क्षेत्रों में घर पर आधारित कामगारों पर केन्द्रित था। अध्ययन क्षेत्र के रूप में कुछ गावों को चुना गया था जिसमें ब्लॉक के बीड़ी बनाने वाले बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता, नियोक्ताओं, स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों, ब्लॉकों, ग्राम पंचायतों, जिला अधिकारियों से डाटा एकत्रित किया गया था।

The main objectives of the study were
अध्ययन के मुख्य उद्देश्य थे -


To highlight the living and working conditions of beedi workers in general and child workers in particular,
सामान्यत: बीड़ी कामगारों तथा विशेष रूप से बाल मजदूरों के जीवनयापन और कार्य करने की दशाओं को रेखांकित करना

To unveil the social and economic realities that forces the children to start beedi rolling at an early age,
उन सामाजिक एवं आर्थिक सच्चाइयों का पता लगाना जो इन बच्चों को कम उम्र में ही बीड़ी लपटेने का कार्य करने के लिए विवश करती हैं

To understand the current trends in child labour in beedi industry and to find a proper explanation as to why child labour in beedi industry is growing, while it is showing, a clear cut decline at national level as a general trend,
बीड़ी उद्योग में बाल मजदूरी की वर्तमान प्रवृत्तिायों को समझना तथा उचित कारण का पता लगाना कि बीड़ी उद्योग में बाल मजदूरी क्यों बढ़ रही है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य प्रवृत्ति के रूप में एक स्पष्ट ह्नास दर्शाता है

To enumerate Go – NGO level intervention towards protection of rights and rehabilitation programmes for the beedi making child labour.
गो- बीड़ी बनाने वाले बाल मजदूरों के अधिकारों के संरक्षण एवं पुनर्वास कार्यक्रमों की दिशा में गैर-सरकारी संगठन स्तर पर की जा रही पहल, की गणना करना


The duration of the project was of 12 months. The study report submitted by CSRA was considered by the Commission. The conclusion and suggestions contained in the report was sent to the State Govt for implementation in Sep 2007.

प्रोजेक्ट की समयवधि 12 महीने की थी। सी एस आर ए द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर आयोग द्वारा विचार किया गया था। रिपोर्ट में दिए गए निष्कर्षों तथा सुझावों को सितम्बर 2007 में क्रियान्वयन हेतु राज्य सरकार को भेजा गया था।


Implementation of the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2000
किशोर न्याय बच्चों की देखरेख एवं सरंक्षण अधिनियम, 2000 का क्रियान्वयन

The NHRC in collaboration with the Socio-Legal Information Centre, New Delhi undertook this study to examine the existing status of the aforesaid Act so far as its implementation is concerned. The study made an effort to compile information on the best practices on juvenile justice.

आयोग ने सोशियो -लीगल इंफोरमेशन सेंटर, नई दिल्ली के सहयोग से यह अध्ययन उक्त अधिनियम के क्रियान्वयन के संबंध में विदयमान स्थिति की जांच करने के लिए किया था। अध्ययन में किशोर न्याय संबंधी उत्ताम प्रथाओं पर सूचना संकलित करने का प्रयास किया गया था।



[VII] RIGHTS OF OTHER VULNERABLE GROUPS
(VII) अन्य कमजोर वर्गों के अधिकार

Status of Tendu Leaf Pluckers in Orissa
उड़ीसा में तेंदु पत्ता तोड़ने वालों की स्थिति

The Commission in March 2004 entrusted a research project titled ‘Status of Tendu Leaf Pluckers in Orissa - A study of their socio-economic conditions with special reference to children and the system of bonded labour’ to Dr. Anil Das, Coordinator, Human Development Society (HDS), New Delhi.

आयोग ने मार्च 2004 में ''उड़ीसा में तेंदु पत्ता तोड़ने वालो की स्थिति - बच्चों के विशेष संदर्भ में उनकी सामाजिक- आर्थिक दशाओं तथा बंधुआ मजदूरी व्यवस्था का एक अध्ययन'' शीषर्क से अनुसंधान प्रोजेक्ट का कार्य डॉ0 अनिल दास, समन्वयक, ह्यूमन डेवलपमेंट सोसायटी (एच डी एस), नई दिल्ली को सौंपा था।


The objectives of the research were
अनुसंधान के उद्देश्य थे :-


To find out the socio-economic background of the tendu leaf pluckers,
तेंदु पत्ता तोड़ने वालों की सामाजिक- आर्थिक पृष्ठभूमि का पता लगाना

To analyze the dynamics of the tendu leaf trade process,
तेंदु पत्ता व्यापार प्रक्रिया की गतिशीलता का विश्लेषण करना

To examine the extent of child labour and bonded labour system in tendu leaf trade,
तेंदु पत्ता व्यापार में बाल मजदूरी तथा बंधुआ मजदूरी व्यवस्था के विस्तार की जांच करना

To find out the social, economic and other problems faced by the pluckers and their families,
पत्ता तोड़ने वालों तथा उनके परिवारों द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक, आर्थिक तथा अन्य समस्याओं का पता लगाना

To suggest remedial measures that can be taken up to address the problems and
समस्याओं से निपटने के लिए उपचारी उपाय सुझाना तथा

To create a database on pluckers with a view to helping the policy makers and others concerned.
नीति निर्माताओं तथा अन्य संबंधितों को सहायता करने की दृष्टिकोण से पत्ता तोड़ने वालों के विषय में डाटा बेस तैयार करना।


The duration of the project was of 08 months. The study report submitted by HDS was considered by the Commission. It gave certain recommendations for the State Govt for the improvement of socio-economic conditions of the tendu leaf pluckers which was sent to them in March 2007.

प्रोजेक्ट की समयावधि 8 महीने थी। एच डी एच द्वारा प्रस्तुत अध्ययन रिपोर्ट पर आयोग द्वारा विचार किया गया था। इसमे तेंदु पत्ता तोड़ने वालों की सामाजिक- आर्थिक दशाओं को सुधारने के लिए राज्य सरकार के लिए कुछ संस्तुतियाँ की गई थी, जिन्हें मार्च 2007 में उन्हें भेज दिया गया था।


A Study of Human Rights Status of De-notified and Nomadic Tribes in Delhi, Gujarat & Maharashtra
    दिल्ली, गुजरात एवं महाराष्ट्र में गैर-अधिसूचित तथा खानाबदोश जनजातियों के मानव अधिकार दशाओं
    का अध्ययन

The Commission in March 2004 entrusted a research project titled ‘A Study of the Human Rights Status of Denotified and Nomadic Communities of Delhi, Gujarat and Maharashtra’ to Prof. G. N. Devy, Trustee, Bhasha Research and Publication Centre, Baroda.

आयोग ने मार्च 2004 में ''दिल्ली, गुजरात एवं महाराष्ट्र के गैर-अधिसूचित तथा खाना बदोश समुदायों की मानव अधिकार स्थिति का अध्ययन'' शीर्षक से अनुसंधान प्रोजेक्ट का कार्य प्रो. जी.एन. देवी, ट्रस्टी, भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर, बड़ौदा को सौंपा था।


The objectives were to study the economic status and occupational patterns of the communities selected for study; patterns of encounter with the police department; incidents of custodial deaths of persons belonging to the communities selected for study; the levels of legal awareness and legal literacy among these communities; and the engagement of these communities with the electoral processes.

अध्ययन के उद्देश्य थे- अध्ययन हेतु चयनित समुदायों की आर्थिक स्थिति तथा व्यावसायिक बनावट; पुलिस विभाग के साथ आमना-सामना किए जाने की बनावट; अध्ययन हेतु चयनित समुदायों से संबंधित व्यक्तियों की हिरासतीय मौतों की घटनाएं; इन समुदायों में विधिक जागरूकता तथा विधिक शिक्षा का स्तर; तथा निर्वाचन क्रियाओं में इन समुदायों की नियोजन का अध्ययन करना।


The duration of the project was of one year. The study report submitted by Prof. Devy was considered by the Commission and it was decided to forward a copy to the State Govt. The report was sent to the State Govt in May 2008 highlighting the issue of non-inclusion of some the Denotified tribes in the category of SC/ST/OBC.

प्रोजेक्ट की अवधि एक वर्ष की थी। प्रो. देवी द्वारा प्रस्तुत अध्ययन रिपोर्ट पर आयोग द्वारा विचार किया गया था तथा राज्य सरकार को इसकी एक प्रति अग्रेषित करने का निर्णय लिया गया था। मई 2008 में राज्य सरकार को रिपोर्ट भेजी गई थी जिसमे कुछ गैर- अधिसूचित जनजातियों को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में शामिल नहीं किए जाने के विषय को रेखांकित किया गया था।


[VIII] RIGHTS OF WOMEN AND CHILDREN
(VIII) महिलाओं और बच्चों के अधिकार

Impact, Community Response and Acceptance of Non Formal Education under the National Child Labour Project – A Case Study of Carpet-Weaving belt of Mirzapur –
    Bhadhoi and Glass – Bangle region of Ferozabad
राष्ट्रीय बाल मजदूरी प्रोजेक्ट के तहत् गैर-औपचारिक शिक्षा का प्रभाव, सामुदायिक प्रक्रिया तथा स्वीकार्यता -मिर्जापुर, भदोही के कालीन बुनाई के क्षेत्र तथा फिरोज़ाबाद के कांच एवं चूड़ी बनाने वाले क्षेत्र का अध्ययन

Entrusted to the Himalayan Research and Cultural Foundation, New Delhi, the study was undertaken by Dr. Bhupinder Zutshi, Visiting Faculty, Centre for the Study of Regional Development, Jawaharlal Nehru University, New Delhi.

इस अध्ययन कार्य को हिमालयन रिसर्च एंड कल्चर फाउंडेशन, नई दिल्ली को सौंपा गया था। डॉ. भूपिन्दर जुत्शी, अतिथि प्राध्यापक, सेंटर फॉर दी स्टडी ऑफ रीजनल डेवलपमेंट जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने यह अध्ययन किया।


The objectives of the study were to examine the initiatives of the government, international and voluntary sectors towards eradication of child labour, rehabilitation and education of working children in India. The study focused on the carpet-weaving and glass-bangle regions in Uttar Pradesh and examined the impact and changes brought by the Non Formal Education (NFE) programme in the region.

अध्ययन के मुख्य उद्देश्य थे - बाल मजदूरी के उन्मूलन भारत में कार्य करने वाले बच्चों के पुनर्वास एवं शिक्षा की दिशा में सरकार, अंतरराष्ट्रीय एवं स्वैच्छिक क्षेत्रों के द्वारा की गई पहलों की जांच करना अध्ययन में उत्तर प्रदेश में कालीन-बुनाई तथा कांच की चूडियां बनाने वाले क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया गया था तथा इस क्षेत्र में गैर औपचारिक शिक्षा (एन एफ ई) कार्यक्रम द्वारा प्रभाव एवं परिवर्तनों की जांच की गई थी।


The study has been completed. It concluded that international pressure, NGOs, judicial activism and concerted efforts made by the National Human Rights Commission have resulted in the adoption of the National Child Labour Project (NCLP) in the areas where children have been engaged in hazardous occupations. The study recommends that the NFE schools should be constructed in accessible locations, the NGOs that are allotted NFE centers must be given adequate orientation training, and a better vocational skill training program for students is necessary. The Commission sent the recommendations to all concerned authorities in the Government of Uttar Pradesh and in the Government of India. In a follow-up action, Dr. Zutshi organized three training workshops in partnership with the Commission and UNESCO.

अध्ययन कार्य पूरा कर लिया गया था। इसका निष्कर्ष था कि अंतराष्ट्रीय दबाव, गैर- सरकारी संगठनों, न्यायिक सक्रियतावाद तथा राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा किए गए संगठित प्रयासों के परिणामस्वरूप उन क्षेत्रों में जहां बच्चों को जोखिमपूर्ण व्यवसायों में नियुक्त किया गया है, राष्ट्रीय बाल मजदूरी प्रोजेक्ट (एन सी एल पी) को अंगीकार किया गया। अध्ययन में संस्तुति की गई कि सुगम स्थानों पर एन एफ ई स्कूलों का निर्माण किया जाए, गैर सरकारी संगठनों जिन्हें एन एफ ई सेंटर आबंटित किए गए हैं, को उचित अभिमुखीकरण प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए तथा छात्रों के लिए एक बेहतर व्यावसायिक दक्षता प्रशिक्षण कार्यक्रम आवश्यक है। आयोग ने इन संस्तुतियों को उत्तर प्रदेश सरकार तथा भारत सरकार के सभी संबध्द प्राधिकारियों को भेजा था। अनुवर्ती कार्रवाई में डॉ. जुत्शी ने आयोग एवं यूनेस्को की साझेदारी में तीन प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन किया।


Action Research on Trafficking in Women and Children
महिलाओं एवं बच्चों में अवैध व्यापार पर कार्य अनुसंधान

The above research was a collaborative venture of NHRC and UNIFEM and was carried out by the Institute of Social Sciences, New Delhi. The main aim of the Action Research was to study the trends, dimensions and magnitude of the problem of trafficking in women and children and to assess the types of existing responses to issues arising from trafficking.

उक्त अनुसंधान राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग तथा यूनिफेम (यू एन आई एफ ई एम) का संयुक्त कार्य था तथा इसे इंस्टीटयूट ऑफ सोशल साइंस, नई दिल्ली द्वारा किया गया था। कार्य अनुसंधान का मुख्य उद्देश्य महिलाओं एवं बच्चों के अवैध व्यापार की प्रवृति, आयामों तथा अवैध व्यापार से उत्पन्न होने वाले विषयों के लिए विद्यमान प्रतिक्रियाओं के प्रकारों का आकलन करना था।

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[IX] OTHERS
(IX) अन्य

Human Rights Aspects of Constitutional Amendment
संवैधानिक संशोधन के मानव अधिकार पहलू

The Commission approved a research proposal received from the National Law School of India University, Bangalore entitled “Human Rights aspects of Constitutional Amendments”. The project analyzed the trends in all constitutional amendments from Human Rights point of view and compiled related extracts from Parliamentary debates, analyze the same and contextualize the amendments from the point of view of strengthening Human Rights regime giving effect to the will of the people.

आयोग ने नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बंगलुरू से प्राप्त प्रस्ताव पर संवैधानिक संशोधन के मानव अधिकार पहलु' शीर्षक से एक अनुसंधान प्रोजेक्ट की मंजूरी दी। प्रोजेक्ट में मानव अधिकारों की दृष्टि से सभी संवैधानिक संशोधनों में प्रवृतियों का विश्लेषण तथा संसदीय वाद-विवादों से संबंधित तत्वों को संकलित करना, उसका विश्लेषण करना तथा जनता की इच्छा को प्रभावित करने वाले मानव अधिकारों को सुदृढ़ करने की दृष्टि से संशोधनों को प्रासंगिता प्रदान करना था।


(Last updated on 15.06.2017)Top