न्यायमूर्ति श्री एच. एल. दत्तू का जीवनवृत्त

न्यायमूर्ति श्री एच. एल. दत्तू
न्यायमूर्ति श्री एच. एल. दत्तू
अध्यक्ष, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
91-11-24663247 (कार्या.)

न्यायमूर्ति श्री एच. एल. दत्तू, भारत के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश ने 29.02.2016 को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, भारत के अध्यक्ष के रूप में पदभार ग्रहण किया। वे राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सातवें अध्यक्ष हैं। न्यायमूर्ति दत्तू का जन्म 3 दिसम्बर, 1950 को कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले में हुआ, अपनी प्रारम्भिक शिक्षा कदूर, तरीकेरी एवं बिरूर में पूर्ण करने के बाद वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए बैंगलूरू चले गए। इन्होंने बेंगलूरू में अपनी एल.एल.बी. की पढ़ाई पूरी की तथा 23 अक्तूबर, 1975 को एक अधिवक्ता के रूप में इन्होंने कर्नाटक बार काउंसिल में नामांकन किया तथा सिविल, आपराधिक, संवैधानिक एवं कराधान मामलों पर वकालत की।

वे 1983 से 1990 तक बिक्री कर विभाग के लिए कर्नाटक उच्च न्यायालय में सरकारी वकील के रूप में पेश हुए, 1990 से 1993 तक सरकारी वकील, 1992 से 1993 तक आयकर विभाग के लिए परामर्शदाता तथा 1993 से 1995 तक आयकर विभाग के लिए वरिष्ठ परामर्शदाता रहे।

उन्हें 18 दिसम्बर, 1995 को कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया तथा 12 फरवरी, 2007 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदोन्नति हुई। 18 मई, 2007 को उनका स्थानान्तरण केरल उच्च न्यायालय में हुआ। 17 दिसम्बर, 2008 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नति हुई। 28 सितम्बर, 2014 को उन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया तथा 2 दिसम्बर, 2015 को वे सेवानिवृत्त हुए।

न्यायमूर्ति दत्तू विभिन्न महत्त्वपूर्ण निर्णयों के साथ जुड़े हुए हैं। वे उस पीठ में भी थे जिसने दोषी आतंकी देवेन्द्र पाल सिंह भुल्लर के मानसिक अस्वस्थता के कारण उसके मृत्युदण्ड को आजीवन कारावास में बदलने तथा सरकार द्वारा उसकी दया याचिका पर निर्णय लेने में हुई असामान्य देरी के मामले में मौत की सजा पर भारतीय न्यायशास्त्र को विस्तार दिया था।

न्यायमूर्ति दत्तू ने उस पीठ की भी अध्यक्षता की जिसमें उन 11 लोगों की रिहाई की गई थी जिन पर आतंकी कानूनों के तहत अभियोग चलाया गया था, जिसमें यह बताया गया कि गुजरात पुलिस केवल अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित होने के कारण, किसी भी निर्दोष व्यक्ति पर आतंकी का ब्रांड नहीं लगा सकती है और उसे सलाखों के पीछे नहीं भेज सकती है। पीठ ने कहा: पुलिस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्दोष व्यक्ति के मन में पीड़ित होने की भावना केवल इसलिए नहीं आनी चाहिए, “माई नेम इज़ खान बट आई एम नॉट ए टेरेरिस्ट”।

न्यायमूर्ति दत्तू ने एक ऐतिहासिक निर्णय की घोषणा की जिसमें कहा गया कि “बेल इज़ द रूल एण्ड जेल एन एक्सैप्शन” यह निर्णय उन्होंने 2जी मामले में पांच बड़े उद्योगपतियों को जमानत देते हुए दिया। न्यायमूर्ति श्री जी. एस. संघवी के साथ पीठ पर यह निर्णय दिया तथा यह कहा कि “न्यायालय उस सिद्धांत को मौखिक से अधिक सम्मान देते हैं जो कहता है कि सजा सिद्धदोष के बाद प्रारम्भ होती है तथा प्रत्येक व्यक्ति को तब तक निर्दोष मानना चाहिए जब तक उस पर विचारण न हो जाए तथा उसे दोषी न पा लिया जाए।”

प्रेस की स्वतंत्रता को कायम रखते हुए न्यायमूर्ति दत्तू ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज़ कर दिया तथा केन्द्र को निर्देश दिया कि वर्ष 2012 में राष्ट्रीय राजधानी के नज़दीक विवादास्पद सैन्य गतिविधि पर रिपोर्टिंग से मीडिया को प्रतिबंधित किया जाए।

कुछ समय से ठण्डे बस्ते में पड़े काले धन के मामले ने फिर से खबरों में प्रमुखता से आना शुरू कर दिया क्योंकि न्यायमूर्ति दत्तू ने यू.पी.ए. सरकार की याचिका को खारिज़ कर दिया तथा मामले की सुनवाई प्रारम्भ कर दी। उन्होंने तत्काल विशेष अन्वेषण दल के गठन का आदेश दिया, 2011 में शीर्ष न्यायालय द्वारा पहले आदेश दिया गया था।

वे उस संवैधानिक पीठ में भी थे जिसने तमिलनाडु के विधिक अधिकार का संरक्षण करते हुए मुल्लापेरियार बांध के 136 फीट में जल स्तर को प्रतिबंधित करने वाले केरल द्वारा लागू कानून को एक “असंवैधानिक” के रूप में घोषित किया।